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भारत में गरीबी रेखा को परिभाषित करना हमेशा से ही एक विवादास्पद मुद्दा रहा है, विशेष रूप से 1970 के मध्य में जब पहली बार इस तरह की गरीबी रेखा का निर्माण योजना आयोग द्वारा किया गया था जिसमें ग्रामीण और शहरी क्षेत्रों में क्रमश: एक वयस्क के लिए 2,400 और 2,100 कैलोरी की न्यूनतम दैनिक आवश्यकता को आधार बनाया गया था।

खेतों से जुड़ती गरीबी ( Poverty associated with farmland ):-

पारम्परिक रूप से मध्यप्रदेश का समाज प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से कृषि को ही जीवन व्यवस्था का आधार बनाता रहा है। इसी कृषि व्यवस्था के कारण वह विपरीत परिस्थितियों जैसे बाढ़, सूखा या आपातकालीन घटनाओं से जूझने की क्षमता रखता था।

विकास से बढ़ता अभाव ( Lack of development ):-

विकास के नाम पर बड़ी परियोजनाओं को शासकीय स्तर पर बड़ी ही तत्परता से लागू किया जा रहा है। इन परियोजनाओं में बांध, ताप विद्युत परियोजनायें, वन्य जीव अभ्यारण्य शामिल हैं जिनके कारण हजारों गांवों को विस्थापन की त्रासदी भोगनी पड़ी और उन्हें अपनी जमीन, घर के साथ-साथ परम्परागत व्यवसाय छोड़ कर नये विकल्पों की तलाश में निकलना पड़ा।

सामाजिक व्यवस्था और गरीबी ( Social order and poverty ):-

मध्यप्रदेश के चंबल और विन्ध्य क्षेत्र ऐसे हैं जहां सामाजिक भेदभाव अपने चरम पर है। यहां ऊॅंची और नीची जाति के बीच चिंतनीय भेद नजर आता है। इन क्षेत्रों में नीची जाति के लोगों के साथ खान-पान संबंधी व्यवहार नहीं रखा जाता है, न ही उन्हें धार्मिक और सामाजिक समारोह में शामिल होने या स्थलों में जाने की इजाजत होती है।

इन्हीं क्षेत्रों में कई समुदाय गरीबी और सामाजिक उपेक्षा के कारण निम्नस्तरीय पारम्परिक पेशों में संलग्न हैं। यहां जातिगत देह व्यापार, जानवरों की खाल उतारना, सिर पर मैला ढोना जैसे पेशे आज भी न केवल किये जा रहे है बल्कि इन समुदाय के लोगों को सम्मानित पेशों में शामिल होने से रोका जा रहा है।

निर्धनता के प्रकार ( Types of poverty )
यह दो प्रकार की होती है—

सापेक्ष निर्धनता– सापेक्ष निर्धनता से अभिप्राय विभिन्न वर्गों , प्रदेशों और देशों की तुलना में पाई जाने वाली निर्धनता से है
निरपेक्ष निर्धनता-निरपेक्ष निर्धनता से अभिप्राय किसी देश की आर्थिक अवस्था को ध्यान में रखते हुए निर्धनता के माप से है
निर्धनता रेखा- वह रेखा है जो उस प्रति व्यक्ति औसत मासिक व्यय को प्रकट करती है जिसके द्वारा लोग अपनी न्यूनतम आवश्यकताओं को संतुष्ट करते हैं*

गरीबों के लिए खाद्य सुरक्षा के मायने( Food Safety Matters for the Poor ):-
भारत में 35 करोड़ लोग गरीबी की रेखा के नीचे रहकर अपना जीवन गुजारते हैं। अपने आप में यह जानना भी जरूरी है कि कौन गरीबी की रेखा के नीचे माना जायेगा।भारत में गरीबी के आर्थिक-सामाजिक-प्राकृतिक कारण ( Economic-social-natural causes of in India )
आश्चर्य की बात है कि प्राकृतिक संसाधनों से समृद्ध माना जाने वाला हमारा देश वैश्विक मानदंडों पर गरीब देशों की श्रेणी में आता है। देश की विशाल जनसंख्या देश में गरीबी का संभवतः सबसे बड़ा कारण है, क्योंकि लगातार होने वाली जनसंख्या वृद्धि प्रति व्यक्ति आय को कम करती है।

जितना बड़ा परिवार, उतनी ही कम प्रति व्यक्ति आय। भूमि और सम्पत्ति का असमान वितरण भी गरीबी का एक अन्य कारण है।

इसके अलावा, देश में मौसम की दशाएँ अर्थात् प्रतिकूल जलवायु लोगों के कार्य करने की क्षमता कम करती है और बाढ़, अकाल, भूकंप तथा चक्रवात आदि उत्पादन को बाधित करते हैं।

संयुक्त राष्ट्र की 2015 में जारी सामाजिक-आर्थिक सर्वेक्षण रिपोर्ट के अनुसार, विश्व में सबसे अधिक भूख से पीड़ित लोग भारत में हैं। विगत 10 वर्षों में गरीबी आधी हो गई है, फिर भी 27 करोड़ भारतीय गरीबी रेखा से नीचे निवास करते हैं, जिनकी आय 1.25 डॉलर प्रतिदिन से कम है।

यहाँ की एक चौथाई जनसंख्या कुपोषण का शिकार है और लगभग एक तिहाई जनसंख्या भूख से पीड़ित है

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